दुखद:नेशनल लेवल का गोल्ड मैडल विजेता खिलाड़ी अब उठाता हैं कूड़ा!

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कानपुर। सुशील कुमार, विजेन्‍दर सिंह को जानते होंगे आप। एक ने पहलवानी में और दूसरे ने मुक्‍केबाजी में देश का नाम दुनिया भर में रोशन किया है। इनके जैसा बनना हर पहलवान और बॉक्‍सर का सपना होगा। लेकिन कानपुर में एक ऐसा बॉक्‍सर भी है,  अपनी पहचान छुपाने जिनकी मजबूरी बन गई है। वजह है आर्थिक तंगी।

कानपुर के जूनियर नेशनल टीम के गोल्‍ड मेडलिस्‍ट बॉक्‍सर कमल कुमार वाल्‍मीकि कूड़ा उठा रहे हैं। इस काम से ही उनका पेट पल रहा है। उनको खुद की बदनामी तो मंजूर है लेकिन अपने खेल की नहीं। शायद इसीलिए वह चेहरे को कपड़े से ढंककर काम करते हैं ताकि कोई उन्‍हें पहचान न सके। वह सड़क पर पड़ा कचरा उठाने का काम करते हैं।

मां भी मंत्री के घर करती हैं सफाई का काम

कमल कुमार के पास कोई नौकरी नहीं है। वह कुछ पैसे कमाने के लि‍ए कूड़ा उठाने को मजबूर हैं। शाम को उन्‍हें रिक्‍शा चलाते देखा जा सकता है। उनका कहना है कि घर चलाने के लिए कुछ करना तो पड़ेगा ही। मैं दलित और गरीब हूं मेरे पास यह काम करने के अलावा और कोई रास्‍ता नहीं है। उन्‍होंने बताया कि मेरी मां भी एक मंत्री के घर में सफाई का काम करती हैं।

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डिस्ट्रिक लेवल पर तीन बार गोल्‍ड मेडलिस्‍ट

कमल कुमार की कहानी किसी फिल्‍म की स्‍टोरी से कम नहीं। वह बचपन में अक्‍सर लड़ते झगड़ते रहते थे। वही झगड़ा और मारपीट उनका शौक बन गया और कमल बॉक्‍सर बन गए। उन्‍होंने डिस्ट्रिक लेवल पर तीन गोल्‍ड मेडल जीते।

नहीं मिलती नौकरी

कमल को कोई नौकरी नहीं देता। उसके अंदर कोच बनने के सारे गुण मौजूद हैं लेकिन उन्हें नौकरी नहीं मिलती। कानपुर के बॉक्सिंग एसोसिएशन के से‍क्रेटरी संजीव दीक्षित कहते हैं कि कमल के बारे में पता है लेकिन हम मजबूर हैं क्‍योंकि कोई स्‍पांसर नहीं मिलता। कमल के कई दोस्‍त आज बॉक्सिंग कोच हैं।

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फिर भी बेटों को बॉक्सर बनाने का सपना

कमल का कहना है कि उन्‍होंने एक कूड़ा उठाने वाली कंपनी के लिए काम करना शुरू किया था लेकिन उनकी 3 महीने की सैलेरी आज तक लटकी पड़ी है। कमल के दो बेटे हैं और वह दोनों को बॉक्‍सर बनाना चाहते हैं। उन्‍होंने बताया कि दो साल पहले एक अफसर ने उनके मेडल्‍स को फर्जी बताया था। बाद में मैंने उसे प्रूफ किया तब वह शांत हुए लेकिन नौकरी फिर भी नहीं मिली।

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