भारत ने पाकिस्तान को डंके की चोट पर कहा आतंकी देश, कर दिया UN में शर्मशार

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संयुक्त राष्ट्र, 14 जुलाई: संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर मुद्दा उठाने को लेकर भारत ने पाकिस्तान को जमकर फटकार लगाई है। भारत ने यह कहकर उसकी निंदा की कि वह ऐसा देश है जो आतंकियों का इस्तेमाल करता है और उन्हें आश्रय देता है। भारत ने यह भी कहा कि पाकिस्तान के कश्मीर विवाद का अंतर्राष्ट्रीयकरण करने के स्वार्थी प्रयास नाकाम हो गए हैं। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि सैयद अकबरुद्दीन ने गुरुवार को पाकिस्तान के कश्मीर मुद्दा उठाने को संयुक्त राष्ट्र के मंच के दुरुपयोग का प्रयास करार दिया।

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उन्होंने कहा, “यह कोशिश पाकिस्तान की ओर से की गई है, पाकिस्तान एक ऐसा देश है जो दूसरों के भू-भाग पर लालच करता है, एक ऐसा देश है जो आतंकवाद को देश की नीति के रूप में इस्तेमाल करता है जो पथभ्रष्ट अंत की ओर जाता है, एक देश जो आतंकियों का गुणगान करता है और संयुक्त राष्ट्र से नामित आतंकियों को आश्रय मुहैया कराता है और एक देश जो मानवाधिकारों के समर्थन और आत्मनिर्णय का ढोंग करता है।”

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इससे पहले संयुक्त राष्ट्र महासभा में “ह्यूमन राइट्स एट द सेंटर ऑफ ग्लोबल एजेंडा” पर उच्चस्तरीय बहस में पाकिस्तान के स्थायी सदस्य मालीहा लोधी ने भारत पर कश्मीर में मानवाधिकारों के उल्लंघन और एक व्यक्ति की न्यायेतर हत्या का आरोप लगाया। उन्होंने उसे कश्मीरी नेता कहकर उल्लेख किया।

वह आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी (22) के संदर्भ में था जो आठ जुलाई को सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारा गया। जम्मू एवं कश्मीर में हुई हिंसा में अब तक 37 लोगों की मौत हो चुकी है।

लोधी ने कहा कि भारतीय सुरक्षा बल कश्मीर की अवाम के आत्मनिर्णय के अधिकारों को दबाने के लिए क्रूरता का सहारा ले रहे हैं।

अकबरुद्दीन ने पाकिस्तान का ध्यान पिछले दिसंबर में मानवाधिकार परिषद के लिए फिर से चुने जाने के प्रयास में उसकी नाकामी की ओर ध्यान दिलाते हुए उसकी विश्वसनीयता खोने का संकेत करार दिया।

उन्होंने कहा, “पाकिस्तान वही देश है जिसका पिछला रिकार्ड महासभा के इसी सत्र में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को मानवाधिकार परिषद की सदस्यता के लिए संतुष्ट कर पाने में नाकाम रहा।”

पाकिस्तान की स्थायी प्रतिनिधि लोधी ने अपनी ही बात का यह कहते हुए खंडन किया कि उत्पात एवं लड़ाई की स्थिति में मानवाधिकारों की गारंटी नहीं दी जा सकती और मानवाधिकारों के एजेंडा को राजनीतिक रंग देने की जरूरत नहीं है।

उन्होंने कहा, किसी खास देश के प्रस्तावों को देशों की सहमति लिए बगैर पेश करना अनुत्पादक साबित हुआ है।

अलग से महासचिव बान की-मून के प्रवक्ता स्टीफन डुजरिक ने मून के इस आग्रह को बार-बार दोहराया कि दोनों पक्ष संयम बरतें।

मून दोनों देशों के मुद्दे के समाधान के लिए सहायता को तैयार हैं, लेकिन यह केवल दोनों तरफ से आग्रह किए जाने के बाद ही हो पाएगा।

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