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योगी आदित्यनाथ पड़ रहे सभी पर भारी

वाराणसी: यूपी इलेक्शन 2017 के लिए चुनावी सरगर्मी तेज हो गयी है। दलित वोटों में सेंध लगाने के लिए बीजेपी ने केशव प्रसाद मौर्य को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है जिससे दलित वोटो में वृद्धि हो सके।

अब देखना यह है कि बीजेपी का यह दांव कितना सफल होता है। वहीं प्रदश में सीएम कैंडिडेट की बात करें तो यह लगभग साफ होता दिख रहा है कि बीजेपी का सीएम पद का चेहरा या तो योगी आदित्यनाथ होंगे या फिर मनोज सिन्हा का नाम इस दौड़ में शामिल है।
लेकिन सबसे पहले योगी आदित्यनाथ का नाम आ रहा है। इसको लेकर संत समाज और विश्व हिन्दू परिषद के लोंगो ने सहमति प्रदान की है और कहा है कि उत्तर प्रदेश में योगी ही भाजपा से सीएम पद का चेहरा होंगे। इससे लोंगो कि अटकले तेज हो गयी हैं कि अबकी बार योगी की ही सरकार बनेगी।
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इस फॉर्मूले से योगी, यूपी में बीजेपी को दिला सकते हैं बम्पर जीत
यूपी के राजनीति का विश्लेषण किया जाए तो एक बात जरूर सामने आती हैं कि समाजवादी पार्टी के पास यादव और मुस्लिम का ठोस वोट बैंक है। जबकि बसपा का दलित वोटबैंक अकेले सब पर भारी पड़ता है। इसके साथ छिटपुट सवर्ण सहित अन्य पिछड़ी-अति पिछड़ी जातियों के लोग जुट जाने से बसपा दमदार लड़ाई लड़ती है। भाजपा का सवर्ण वोट बैंक भी अब बिखर चुका है।
पिछले 14 साल से यूपी की सत्ता से हुए वनवास को खत्म करने में पार्टी के खिलाफ प्रदेश का यही जातीय समीकरण विलेन बना हुआ है। ऐसे में यूपी में सिर्फ योगी आदित्यनाथ के पास ही पार्टी के हिंदुत्व कार्ड को चमकाने की क्षमता है।
जिससे पैदा हुई लहर से वे सपा-बसपा के पक्ष में बने जातीय समीकरण को मात दे सकते हैं। योगी धार्मिक आधार पर जातियों की सीमा तोड़कर हिंदू वोट अपने पाले में कर सकते हैं। इन्हीं सब वजहों से योगी की बतौर सीएम मजबूत दावेदारी है।
उनके सीएम बनने से हिंदुत्व लहर से भाजपा को भले फायदा हो जाए मगर अब तक भाजपा को कुछ मिल रहे मुस्लिम वोट से हाथ भी धोना पड़ सकता है। लेकिन एक सच ये भी हैं की भाजपा को मुस्लिम वोट मिलता ही कितना है।
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भाजपा के लिए कितने फायदेमंद हैं योगी
संतों के सबसे प्रमुख संगठन नाथ संप्रदाय के आदित्यनाथ मुखिया हैं। जिससे संघ की उन पर दरियादिली बरसना लाजिमी है। वे यूपी में अति सक्रिय और जोशीले युवाओं के संगठन हिंदू युवा वाहिनी का संचालन करते हैं।
गोरखपुर के गोरक्षपीठ का महंत होने के कारण गोरखपुर सहित यूपी में धार्मिक, सामाजिक और राजनैतिक प्रभाव उन्हें विरासत में मिला है। गोरखपीठ की ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि महज 26 साल की उम्र में ही योगी आदित्यनाथ सांसद हो गए थे। अब तक इस सीट से लगातार पांच बार संसद पहुंचे हैं। उनसे पहले जब महंत अवेद्यनाथ रहे तो वे भी सासंद और उनके गुरु दिग्विजनाथ भी सांसद रहे।
कहने का मतलब गोरखपीठ का महंत जो बना तो वह सांसद हो गया। हिंदुत्व की भावना के साथ सियासत का गठजोड़ उन्हें विरासत में मिला है।

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