एक शहीद का देशवासियों के नाम मार्मिक पत्र, जिसे पढ़ कर आपके आँसू छलक आएंगे !

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प्यारे देशवासियों, कैसे हैं आप सभी लोग? आशा करता हूं आप सभी लोग धरती पर हमारे बाकी जवानों की तत्परता की वजह से अमन-चैन से होंगे। उन्हें मेरा सलाम कहिएगा। मैं भी यहां ठीक हूं, लेकिन जैसा आप सोच रहे होंगे यहां स्वर्ग-नर्क जैसा कुछ भी नहीं है। हां, इसे आप किसी ग्रह का नाम दे सकते हैं, पर यहां की ख़ास बात यह है कि यहां पर सभी मेरी ही तरह हैं, जो किसी जंग की वजह से शहीद हुए हैं। भारत के भी हैं और पाकिस्तान के भी हैं। अमेरिका के शहीदों से भी मेरी मुलाकात है, तो यहां रह रहे चीनी शहीदों को भी मैं जानता हूं। यहां वे भी हैं, जिनको धरती पर हिंदू पुकारा जाता है, तो ऐसे भी हैं जिन्हें अापने मुसलमान का नाम दिया है। लेकिन मज़े की बात यह है कि हम सभी की शक्लें एक हैं तो नाम भी एक हैं। और वह है ‘शहीद’। इसलिए अगर आप चाहें तो इस जगह को ‘शहीद ग्रह’ नाम से भी पुकार सकते हैं।

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मुझे पता है कि आपको यह सुनने में थोड़ा अजीब लग रहा होगा। मुझे भी लगा था। अजीब लगता भी क्यों नहीं, क्योंकि देश की सेवा करते जिनको मैने मारा था, वे भी हैं यहां, और जिनके हाथों मेरी शहादत हुई थी, यहां वे भी हैं। हां, शुरू में थोड़ा मुश्किल था, साथ रहना थोड़ी बहस और तकरारें भी हुईं। पर जो सबसे अच्छी बात है यहां की वो है कि यहां हमारे हाथों में बंदूकें नहीं हैं। वह इसलिए कि यहां कोई देश नहीं है और न ही यहां कोई सीमा है। कुल मिलाकर हमें बांट सकने वाली लकीरों वाली कोई सीमा नहीं है।

न तो यहां कोई धर्म को लेकर झगड़ा है और न ही किसी ज़मीन को लेकर, क्योंकि जो हमारे विचारों को लेकर हमें अलग कर सके, ऐसा न तो कोई भगवान हैं यहां और न ही खुदा। यहां जो कोई भी रहता है, वह सिर्फ़ इंसान हैं। मेरी यहां मुलाकात बिस्मिल से भी हुई और भगत सिंह जी से भी। यहां हमारे बापू गांधी भी हैं और मंडेला जी भी। काफ़ी कुछ सीखने को मिलता है। अक्सर ही उन्हेॆ धरती की हालत देख कर चिंतित होते देखा है। उनसे काफ़ी कुछ मानवता और इंसानियत के बारे में जान पाया हूं। काफ़ी बातें होती हैं हमारी और उन बातों का जो सार निकला वह ये है कि जंग हमेशा विचारधाराओं की होनी चाहिए, जो इंसानियत के भलाई के लिए हो, न की इंसान से’। जब से यह बात समझ सका, तब से कभी-कभी दुःख होता है कि आजतक जितनी भी मैनें जंग लड़ी, वो तो सिर्फ़ मेरी खुद से थी, वह तो सिर्फ़ इंसानों से थी। खैर इंसान की हर ग़लती का खामियाज़ा तो मानवता और इंसानियत को ही भुगतना पड़ता है, पर अफ़सोस जिनको सज़ा मिली, वे यहां मेरी तरह लगभग सारे ही हैं

वैसे मैने यह खत इस वजह से भी लिखा हैं कि, जिन्हें मैं पीछे छोड़ आया हूं मेरा बेटा, मेरी पत्नी, बूढ़े माता-पिता, उन्हें यह एहसास दिला सकूं कि उन्हें मैं आज भी याद करता हूं। परिवार की मुझे आज भी फिकर होती हैं। जानना चाहता हूं कि मेरे जाने के बाद मेरे कलेजे के टुकड़े को दिन-भर में एक ग्लास दूध का भी मिल पाता है या नही?  वह पढ़ने जा रहा है कि नही? कुछ दिन पहले ही मेरे गांव से एक ‘शहीद’ का आना हुआ। वह बता रहा था कि घर की हालत ठीक नहीं है। मेरी विधवा पत्नी को दूसरे के घरों में काम करना पड़ता है, क्या ये सच है?

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वह यह भी कह रहा था मेरे बूढ़े पिता को मेरी शहीदी के मुआवज़ा के लिए सरकारी दफ़्तरों में चक्कर लगाना पड़ता है। क्या उन्हें सम्मान की नज़र से नहीं देखा जाना चाहिए कि वह एक शहीद के पिता हैं? ये भी पता चला कि लोगों के तमाम समझाने के बाद भी मेरी मां ने वह मोटर साइकल नही बेची, जिसपर मैं शान से चला करता था। क्या देश को मुझसे जुड़ी चीज़ों पर अब गर्व नही है? यह सुन कर बहुत दुःख हुआ कि गांव के दबंगों ने हमारी ज़मीन हड़प ली? क्या देश की सीमा के गौरव पर मर मिटने वाले को यही इंसाफ़ मिलना बाकी था? वह तो ये भी बता रहा था मेरा शेर सा बेटा जो हमेशा ही फ़ौज़ में जाने के लिए ज़िद करता रहता था, पिछले हफ्ते भूख लगने की वजह से दुकान से पाव रोटी उठा लाया। उसके बाद बेटे को उसी दुकानदार ने चोर कह के पीटा, जो अख़बारों और टीवी पर मेरा घनिष्ट मित्र होने का दावा कर मेरे देश भक्ति के लिए आंसू बहा रहा था? अचानक से इतना परिवर्तन कैसे हो गया? क्या एक सिपाही का बेटा अब फ़ौज़ में नहीं जाना चाहता?

तो.. तो क्या मेरा शहीद होना मेरे परिवार के लिए दुर्भाग्य है? क्या वह नेता मेरे घर का हाल भी नहीं लेने आते, जो चुनाव के वक्त मुझसे मंच साझा करने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाते थे? क्या उस सरकार को भी हमारी कोई फिकर नहीं है, जिसकी साख के लिए हम इंसान से लड़ रहे थे? अगर नहीं, तो कृपया कोई अगर मेरे गुमनाम परिवार को जानता हो, तो मेरी विधवा पत्नी को जाकर यह संदेश दे कि वह तगमा बेच दे, जिसे उसने मुझे गंवा कर पाया है जिसे वह सीने में लगा कर मेरी बहादुरी के निशानी के रूप में रखती है।

क्योंकि अब मुझे लगता है कि वह मेरी बहादुरी थी ही नहीं। असल में मैं उस जंग में था ही नहीं, जो मुझे लड़ना चाहिए था। मेरी जंग इंसानियत के खिलाफ थी। वे कितने भी बुरे विचार वाले ही क्यों न हों, पर मेरे हाथों से मौत सिर्फ़ और सिर्फ़ इंसान की हो रही थी । मुझे कहते हुए दुःख होता है, परंतु मैं आग्रह करना चाहता हूं कि आप सब मुझे शहीद न पुकारें, क्योकि इसका दर्द जो मेरे परिवार और इंसानियत को झेलना पड़ा है, उसका बोझ बहुत ज़्यादा है।

जय हिंद

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