bebacbharat@gmail.comClick on the button to contact

जानिये आखिर क्यों गंगा सिर्फ़ नदी नहीं, बल्कि हमारी मां है!

गंगा सिर्फ़ एक नदी का नाम ही नहीं, बल्कि यह जीवनदायिनी है. गंगा की लहरों ने न जाने कितनी सभ्यताओं व संस्कृतियों को बनते-बिगड़ते देखा. वैदिक काल से लेकर आधुनिक युग तक के उत्थान-पतन की गवाह है गंगा. राजनीति, अर्थनीति, सामाजिक व्यवस्था से लेकर धर्म, आध्यात्म, पर्यटन, पर्यावरण तक सब इससे प्रभावित होते रहे हैं. एक ही गंगा के न जाने कितने रूप हैं. हर कोई उसे अपने-अपने नज़रिए से विश्लेषित करता है. इसके तट पर विकसित धार्मिक स्थल और तीर्थ भारतीय सामाजिक व्यवस्था के विशेष अंग हैं. अगर इन सबकी बात न भी करें तो गंगा हर भारतीय के रग-रग में रची-बसी है. राष्ट्रीय नदी गंगा भारत की सबसे लंबी नदी है, जो हिमालय से बांग्लादेश तक पर्वतों, घाटियों और मैदानों में 2,525 किलोमीटर की दूरी तय करती है. शायद इसीलिए गंगा दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी नदी मानी जाती है.

हिंदू धर्म में गंगा नदी को देवी गंगा के रूप में पूजा की जाती है. यह करोड़ों लोगों के लिए जीवन रेखा और आस्था का प्रतीक है. इतिहासकारों और पुराणविदों के अनुसार, गंगा को भारतीय सांस्कृतिक विरासत, परंपरा और जीवनशैली का अहम अंग माना जाता है.

Source: prernamurti

दरअसल, गंगा नदी हिमालय के गढ़वाल क्षेत्र के गंगोत्री ग्लेशियर से निकलती है. यह नदी उत्तर भारत से बहती हुई पूर्व में बंगाल की खाड़ी में समाहित हो जाती है. इसके अलावा गंगा की सभी पांच सहायक नदियां अलकनंदा, भागीरथी, मंदाकिनी, धौलीगंगा और पिंडर उत्तराखंड के उत्तरी हिमालयी क्षेत्र से ही निकलती हैं. सबसे खास बात ये है कि गंगा के साथ-साथ इन नदियों को भी काफ़ी पवित्र माना जाता है. गंगा का इन पांचों नदियों से संगम भी होता है. इन पांचों को संगम को विष्णु प्रयाग, नंद प्रयाग, कर्ण प्रयाग, रुद्र प्रयाग और देव प्रयाग के रूप में जाना जाता है और इन पांचों प्रयागों को पंच प्रयाग कहा जाता है. इसके अलावा, गंगा में प्रवाहित होने वाली कुछ और नदियां ब्रह्मपुत्र, गोमती, गंडक, कोसी, यमुना, घाघरा और सोन नदी भी हैं.

हिंदुओं में गंगा नदी को लेकर ऐसी मान्यता है कि गंगा जी के दर्शन, स्पर्श, स्नान और पान से सभी प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं. हिंदू समाज में लोग गंगा जल में स्नान करके अपने पूर्वजों एवं ईश्वर को जल अर्पण करते हैं. लोग गंगा जल को हाथों में लेकर तर्पण करते हैं. गंगा के प्रति ये आस्था ही है कि लोग फूलों और दीये को गंगा में प्रवाहित करते हैं. ऐसा कोई हिंदू परिवार नहीं हो सकता, जिसके घर में गंगा जल न हो. दरअसल, हिंदू धर्म में हर धार्मिक अनुष्ठान में गंगा जल का प्रयोग होता है और इसके बिना किसी भी अनुष्ठान को शुभ और सफल नहीं माना जाता.

Source: jansatta

गंगा के प्रति ये आस्था और विश्वास का चरम ही है कि लोग ये मानते हैं कि मृत व्यक्तियों की अस्थियों को गंगा में प्रवाहित करने से आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है. गंगा का महत्व भारत में इतना है कि भारत की कुछ अन्य क्षेत्रीय नदियों को भी गंगा के बतौर रेखांकित किया जाता है. इसी क्रम में दक्षिण में कावेरी नदी को दक्षिण की गंगा माना जाता है. अगर मध्य भारत की बात करें, तो गोदावरी को गंगा के रूप में जाना जाता है. हिंदू धर्म में गंगा को पापों से मुक्ति दिलाने वाली माना गया है.

दरअसल, ऋग्वेद के प्रारंभिक काल में गंगा को प्रमुख पवित्र नदी नहीं माना जाता था. गंगा के बजाय उस वक़्त सिंधु और सरस्वती नदियां सबसे अधिक पवित्र मानी जाती थीं. कालांतर में गंगा अत्यधिक महत्वपूर्ण तब हो गईं, जब मौर्य साम्राज्य और मुगल साम्राज्य के दौरान गंगा के आस-पास का मैदानी इलाका शक्तिशाली राज्यों का केंद्र बन गया.

गंगा के बारे में ऐसा माना जाता है कि ज्येष्ठ महीने में शुक्ल पक्ष की दशमी अर्थात जून माह में गंगा का स्वर्ग से धरती पर अवतरण हुआ था. इस पवित्र तिथि पर हर साल जून में अवतरण दिवस या गंगा दशहरा पर्व मनाया जाता है. इस दिन लोग गंगा के तट पर बड़ी संख्या में स्नान करने के लिए उमड़ते हैं. क्योंकि वे मानते हैं कि इस दिन गंगा स्नान से उनके सारे पाप अवश्य ही धुल जाएंगे और उन्हें समृद्धि भी प्राप्त होगी. वेद और पुराणों में अवतरण को लेकर कई कहानियां हैं. लेकिन सभी कहानियों में से सबसे लोकप्रिय और महत्वपूर्ण प्रसंग भगवान शिव से संबंधित है.

Source: arzoo

गंगा का धरती पर अवतरण और शिव की लोकप्रिय कहानी…

कहानी कुछ इस तरह से चलती है. माना जाता है कि सतयुग में राजा सागर ने खुद को अधिक शक्तिशाली बनाने के लिए अश्वमेध घोड़े को छोड़ अश्वमेध यज्ञ का आयोजन करवाया. इस खबर से देवताओं के राजा देवराज इंद्र काफ़ी भयभीत हो गये और उन्हें यह चिंता सताने लगी कि कहीं उनका सिंहासन न छिन जाए. इसलिये इंद्र ने अश्वमेध घोड़े को चुराने का फैसला किया.

इन्‍द्र ने यज्ञ के अश्‍व को चुराकर कपिल मुनि के आश्रम में एक पेड़ से बांध दिया. उस वक़्त मुनि गहरे ध्यान में लीन थे. जब सागर को घोड़ा नहीं मिला, तो राजा सागर ने अपने 60 हजार बेटों को उसकी खोज में भेजा. उन्‍हें कपिल मुनि के आश्रम में वह घोड़ा मिला. यह मानकर कि कपिल मुनि ने ही उनके घोड़े को चुराया है, वो पेड़ से घोड़े को छुड़ाने के लिए धावा बोल दिये. उनके शोरगुल से मुनि के ध्‍यान में बाधा उत्‍पन्‍न हो रही थी और जब उन्‍हें पता चला कि वे यह सोच रहे हैं कि मैंने घोड़ा चुराया है तो वे अत्‍यन्‍त क्रोधित हुए. मुनि की क्रोधाग्नि की एक दृष्टि से ही उनके सारे बेटे भस्म हो गये.

कुछ दिन बाद राजा ने अपने पोते आयुष्‍मान को घोड़ा लाने के लिए मुनि के पास भेजा. वहां उसने पाया कि इससे पहले राजा के सभी बेटे अन्तिम संस्‍कार के बिना ही राख में बदल गए थे. इसलिए वे प्रेत के रूप में भटकने लगे. आयुष्‍मान ने कपिल मुनि से याचना की कि वे कोई ऐसा उपाय बताएं, जिससे उनके अन्तिम संस्‍कार की क्रियाएं हो सकें. ताकि वो प्रेत आत्‍मा से मुक्ति पाकर स्‍वर्ग में जगह पा सकें. मुनि ने कहा कि इनकी राख पर से गंगा को प्रवाहित करने से ही इन्‍हें मुक्ति मिल पायेगी. इसके लिए गंगा को धरती पर लाने के लिए ब्रह्मा से प्रार्थना करनी होगी.

Source: grehlakshmi

कई पीढि़यों बाद सागर के कुल के बड़े पोते भगीरथ ने हजारों सालों तक गंगा को धरती पर लाने के लिए ब्रह्मा की कठोर तपस्‍या की. तपस्‍या से प्रसन्‍न होकर ब्रह्मा ने गंगा को धरती पर उतारने की भगीरथ की मनोकामना पूरी कर दी. लेकिन स्वर्ग से धरती पर गंगा का अवतरण होना इतना सहज भी नहीं था. गंगा को इस बात का एहसास था कि उनकी धारा का प्रवाह इतना तेज है कि उनके रास्ते में आने वाली सभी चीज़ें बर्बाद हो जाएंगी. इसलिए उन्होंने यह प्रस्ताव रखा कि जब तक उनके वेग को कोई संभाल न लें, तब तक वे धरती पर नहीं उतर सकतीं. इसके लिए त्रिदेवों में सिर्फ़ शिव जी ही ऐसे थे, जो गंगा के इस शक्तिशाली वेग को संभाल सकते थे. इसलिए उन्होंने गंगा को अपनी जटाओं में थाम लिया.

तत्पश्चात शिव जी ने गंगा को धीरे-धीरे अपनी जटाओं से आज़ाद किया और तब गंगा भागीरथी के नाम से धरती पर आईं. सागर पुत्रों के राख के ढेरों से गुजरते हुए गंगा पृथ्वी पर आईं. इस तरह से राजा के सभी बेटों को मोक्ष की प्राप्ति हुई और पुन: एक और जीवन पाया. इसके साथ ही गंगा का धरती पर बहना शुरू हुआ और लोग अपने पाप धोने को उसमें पवित्र डुबकी लगाने लगे.

Source: grehlkakshmi

आज नदियों में लगातार बढ़ रहे प्रदूषण के बावजूद भी गंगा उतनी ही निर्मल और पावन है, जितनी वो पहले हुआ करती थी. बस उनके मूल स्वरूप में दिन-प्रतिदिन बदलाव देखे जा रहे हैं. बस आज ज़रूरत है गंगा के अस्तित्व को मानव प्रयास से कायम करने की, स्वच्छ रखने की. हर-हर गंगे.

Source: bharatyatra

loading...