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अतित में किए गए पापों से मुक्ति पाने के लिए आज से आरंभ करें ये काम

कई बार ऐसा सुनने में आता है, क्या करूं, यह मेरा स्वभाव है।  एक कहावत भी है कि कोयले को जितना मर्ज़ी धो लो, उसका कालापन रह ही जाता है। उसी प्रकार से व्यक्ति का जो स्वभाव होता है, वो बदलता नहीं है। पर भक्तों की संगति, श्रीहरिनाम संकीर्तन, इत्यादि ये ऐसी प्रभावशाली साधना है, कि व्यक्ति के स्वभाव को भी बदल देती हैं।
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श्रीचैतन्य चरितामृत में एक कथा आती है, शिकारी की। उस शिकारी का ऐसा शौक है कि वो जानवरों को तड़पा-तड़पा कर मारता था। एक बार श्रील नारद गोस्वामी जी जंगल से जा रहे थे। उन्होंने ने देखा कि कुछ-कुछ दूरी पर जानवर जमीन पर लेटे हैं, उनके तीर लगे हुए हैं और सब के सब तड़प रहे हैं। यह नज़ारा देख कर श्रील नारद गोस्वामी सोच रहे हैं कि मैं जिस रास्ते से जा रहा हूं उस पर जानवर ऐसे क्यों मिल रहे हैं? एक नहीं, दो नहीं, तीन नहीं, कई हैं। इसका अर्थ है कि जो कोई यह कर रहा है, यहीं कहीं आस-पास ही होगा क्योंकि तीर कुछ समय पहले ही मारे गये लगते हैं।
कुछ आगे जाने पर देखा कि एक काला सा व्यक्ति एक हिरण पर निशाना साध रहा है। श्रील नारद जी के सूखे पत्तों पर चलने से आवाज़ हुई जिसके कारण हिरण चौकन्ना हो गया और भाग गया। शिकारी थोड़ा तिलमिलाया। बोला, “आपने मेरा शिकार खराब कर दिया। कुछ चाहिए था तो घर से ले लेते।”
श्रील नारद जी बोले,”मुझे कुछ नहीं चाहिए। मैं जब आ रहा था तो मैंने देखा कि बहुत से जानवर हैं जिनके तीर लगे हुए हैं और वे तड़प रहे हैं। मैं तो केवल यह जानना चाह रहा था कि यह सब किसने किया?”
बड़े घमण्ड से शिकारी ने कहा, “मैंने।”
(शिकारी ने ऐसे उत्तर दिया जैसे उसने बहुत महान काम किया हो। तमोगुण होने से ऐसा ही होता है। तमोगुण बढ़ने से व्यक्ति दूसरों के दुःख से खुश होता है। दूसरों की परेशानी से उसे आनन्द होता है।)
श्रील नारद जी ने पूछा,”आप ऐसा क्यों करते हैं?”
शिकारी, “यह तो मेरा काम है। मेरा व्यवसाय है।”
श्रीनारद,”ठीक है, यह तुम्हारा व्यवसाय है किन्तु इनको तड़पा क्यों रहे हो? मैंने रास्ते में देखा कि सभी जानवर तड़प रहे हैं।”
शिकारी,”जानवर जितना तड़पते हैं न, मुझे उतना सुख होता है। इसलिए मैं किसी भी जानवर को मारता नहीं हूं, तड़पाता हूं। उनको तड़पता देख कर मुझे बड़ा आनन्द आता है।”
श्रील नारद जी ने गम्भीर स्वर से कहा,”आपको तो बहुत कष्ट सहना होगा।”
शिकारी, “क्यों?”
यह जानवर जो तड़प रहे हैं, इनकी तो तड़फन है, इसमें जो उन्हें कष्ट हो रहा है, एक-एक जानवर को मरने से पहले जो यह शारीरिक और मानसिक कष्ट मिल रहा है, यह सब आपको भोगना पड़ेगा।
कभी-कभी छोटी सी बात व्यक्ति का जीवन बदल देती है। श्रीनारद जी की बात उस शिकारी के हृदय में चुभ गई।
शिकारी का माथा ठनका। उसने कहा, “यह क्या कह रहे हैं, आप?”
हां, यह सारा कर्म-फल आपको भोगना होगा – नारदजी ने जवाब में कहा।
ओह! मैंने तो जीवन में कितने ही जानवरों को तड़पा-तड़पा कर मारा है। इसका हिसाब ही नहीं है।
आपके पास हिसाब चाहे हो न हो। कर्म-फल देने वाले के पास सारा हिसाब-किताब है। एक-एक पाप कर्म का हिसाब लिया जाएगा।
शिकारी यह सुन कर घबरा गया और बोला,”अच्छा! क्या ऐसा कोई उपाय है, जिससे मुझको तड़पना न पड़े। मैंने तो न जाने कितने ही जानवरों को तड़पा-तड़पा कर मारा है।”
हां! उपाय तो है। धनुष तोड़ दो।
धनुष तोड़ दूं? यह तो मेरा व्यवसाय है। इसके बिना मैं खाऊगा क्या? रहूंगा कहां?
वो व्यवस्था मैं करूंगा। आपके रहने की, खाने की व्यवस्था मैं करूंगा।
(जब व्यक्ति के मन में आ जाए कि मैंने सुधरना है, तो हर परिस्थिति को वो स्वीकार कर लेता है।)
शिकारी ने धनुष तोड़ दिया।
श्रीनारद जी ने कहा, “अब आप घर जाएं। इस पाप की कमाई से जो भी धन आपने इकट्ठा किया है, उसे बांट दें। घर में कोई और भी है?”
जी, मेरी पत्नी है।
उसे भी यहीं ले आओ। आप दोनों मेरे पास आ जाओ। जीवों को तड़पा-तड़पा कर, मार कर जो भी रूपया-पैसा इकट्ठा किया है, मकान, सब कुछ बांट आओ।
शिकारी चला गया। उसने अपनी पत्नी को सारी बात बताई व समझाई। थोड़ी देर के बाद दोनों के दोनों श्रीनारद गोस्वामी जी के पास आ गए।
नारद जी के उनको छोटा सा, एक कुटियानुमा मकान दिया रहने के लिए, श्रीमती तुलसी जी का पौधा दिया सेवा करने के लिए, फिर दोनों को श्रीहरिनाम करने का आदेश दिया। साथ ही साथ सात्विक भाव से रहने का उपदेश भी दिया।
सारी बात, नियम इत्यादि समझाकर नारदजी चले गए।
लगभग एक साल के बाद श्रीनारद जी, पर्वत मुनिजी के साथ, उधर से जा रहे थे, तो नारदजी ने कहा,”यहां पर मेरा एक शिष्य रहता है। चलिये, आपको मिलाता हूं उससे।”
पर्वत मुनि जी और नारद जी उधर की ओर चल दिए। शिकारी ने जब सुना कि उनके गुरुजी आ रहे हैं तो वे हर्ष से फूले नहीं समा रहे थे। हृदय आनन्द के हिलोरे लेने लगा। इतने उतावले हो गए, कि जिस हालत में थे, उसी में ही अपने गुरुदेव की ओर लपके।
उधर पर्वत मुनि देख रहे हैं कि ये कैसे दौड़ते हुए आ रहे हैं। एक पैर इधर, रखते हैं तो दूसरा कहीं ओर। कभी बाएं, कभी दाएं तो कभी सीधा। पर्वत मुनि हैरान हुए जा रहे हैं। फिर जब पास आए तो गुरुदेव के सामने वाली जगह को कपड़े से साफ कर, दण्डवत प्रणाम किया।
नारदजी सारी बात समझ रहे थे। उन्होंने शिकारी का इतिहास पर्वत मुनि जी को सुनाया। फिर बोले,” यह एक क्रूर, निष्ठुर स्वभाव के शिकारी थे और पता है कि अब ये इधर-उधर दौड़ते हुए क्यों आ रहे थे? फिर यहां आकर स्थान साफ क्यों किया? इनके मन में यह भावना थी कि मेरे दौड़ने से कहीं कोई कीड़ी मेरे पैर के नीचे दब के न मर जाएं। मैं जब प्रणाम करूंगा, तब कोई छोटा कीड़ा मेरे नीचे दब के न मर जाए।”
देखिए, ऐसा स्वभाव में, हृदय में, जीवन में परिवर्तन। ऐसा कैसे सम्भव हुआ? श्री नारद जी के संग से, भक्त के उपदेश से, तुलसी जी की सेवा से, श्रीहरिनाम के प्रभाव से। और सात्विक जीवन जीने से।
तो स्वभाव भी परिवर्तन हो जाता है, दुष्ट-दुष्ट भी अच्छे स्वभाव वाला हो जाता है, भगवद्-भक्त के उपदेशों से, श्रीमति तुलसी जी की सेवा से, श्रीहरिनाम संकीर्तन से और सात्विक जीवन जीने से।
श्री चैतन्य गौड़िया मठ की ओर से
श्री भक्ति विचार विष्णु जी महाराज
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