100 रुपए के नोट ने बदल दी जिंदगी, आज हैं करोड़ों के मालिक!

मेहनत, हिम्मत से हर कल्पना साकार हो जाती है। इसका जीता जागता उदाहरण हैं प्रणलाल जिन्होंने कचरे में मिले 100 रुपए के नोट से अपना काम शुरू किया और आज वह करोड़ों के मालिक हैं। प्राणलाल गिरधर लाल मोदी की जिंदगी में 100 रुपए के नोट से आया यह बदलाव किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं। जामनगर (गुजरात) के ध्रोण के रहने वाले प्राणलाल की शुरुआती जिंदगी संघर्ष में बीती।

बचपन में ही हो गई थी पिता की मौतः

कूड़े से मिले 100 रुपए ने बदली जिंदगी, आज हैं करोड़ों के मालिक

20वीं सदी की शुरुआत में गुजरात में भयंकर प्लेग फैला। जिससे लाखों लोगों पर संकट छा गया। उस वक्त प्राणलाल के दादाजी खेमचंद जामनगर के सेठ हुआ करते थे। 1910 में महामारी के रूप में आए प्लेग ने उनके व्यवसाय को चौपट करके रख दिया। प्राणलाल के पिता गिरधर लाल बचपन में ही चल बसे। उस समय प्राणलाल की उम्र महज 13 साल थी। छोटे-छोटे दो भाई, हीरालाल व जयंतीलाल और एक बहन की जिम्मेंदारी अचानक उनके ऊपर आ गई।

मालिक का बचा खाना खाकर गुजारे दिनः

जिम्मेंदारी ने जिंदगी को नजदीक से देखने का मौका दिया। रोजी-रोटी की तलाश में वह जामनगर में ट्रेन में बैठ गए और जमशेदपुर पहुंच गए। यह बात 1924 की है। उन्होंने यहां पहुंचकर कालीमाटी (अब साकची) में मगनलाल कालीदास हार्डवेयर की दुकान में सालाना 150 रु. पगार पर नौकरी कर ली। दिन भर दुकान में रहते और रात में घर का काम करते। मालिक का बचा खाना रात में खाकर सो जाते थे।

100 रुपए के नोट ने बदली जिंदगीः

रोज पांच पैसा नाश्ते के लिए मिला करता था। ईमानदारी की प्रतिमूर्ति प्राणलाल पर मग्नलाल ने भरोसा जताया और उन्हें माल लाने के लिए कोलकाता भेजने लगे। कोलकाता स्थित बड़ा बाजार से माल लाने लगे। एक दिन बड़ा बाजार में कचरे के ढेर के पास वे बैठे हुए थे, तभी 100 का नोट दिखा। उस समय 100 रु. की कीमत होती थी। कोलकाता के थोक विक्रेता से जान-पहचान तो थी ही। बस क्या था, 100 रु. में हार्डवेयर का सामान खरीद लिया और जमशेदपुर में बेचने लगे।

ईमानदारी ने दिलाई सफलताः

साकची स्थित वुल हाउस को भला कौन नहीं जानता। वहीं पर प्राणलाल ने दुकान खोली। सुबह चार बजे ही दुकान खुल जाती थी। टाटा स्टील में काम करने वाले कर्मचारी उनके यहां से सामान ले जाते थे। कुछ दिन बाद टाटा स्टील में औद्योगिक ग्लब्स सप्लाई करने का काम मिला। ठेला पर ग्लब्स लेकर कंपनी में सप्लाई किए। कुछ दिन बाद उनकी ईमानदारी को देखते हुए टाटा स्टील के एक अधिकारी ने उन्हें स्टेशन वैगन मुहैया करा दिया।

बच्चों की पढ़ाई से कभी नहीं किया समझौताः

जिंदगी की परेशानियों को साहसपूर्वक झेलने वाले प्राणलाल ने अपने बच्चों की पढ़ाई से कभी समझौता नहीं किया। तब पारिख व कमानी परिवार के अलावा प्राणलाल के बेटे ही थे, जो अंग्रेजी माध्यम में पढ़ा करते थे। प्राणलाल के दो बेटे और पांच बेटियां हैं। इतना बड़ा परिवार को पालने की जिम्मेंदारी उनपर थी, लेकिन कभी वह हिम्मत नहीं हारे। भाई जयंतीलाल को भी व्यवसाय में उतारा।

सामाजिक कार्यों में भी रहा अहम योगदानः

प्राणलाल का सामाजिक क्षेत्र में भी अहम योगदान रहा। 35 साल तक वह साकची स्थित जैन भवन के अध्यक्ष रहे। साकची गुजराती स्कूल की स्थापना में भी उनका मुख्य योगदान रहा। प्राणलाल के बेटे अशोक मोदी व राजेश मोदी ने पिता की विरासत को आगे बढ़ाया। 1990 में आइसक्रीम की फैक्ट्री खोली लेकिन राजनीतिक माहौल खराब होने के कारण उसे बंद कर देना पड़ा।

बाद में वाडिलाल का सीएनएफ लिया। आज दोनों भाई साकची शीतला मंदिर के पास स्थित पीएम मॉल व वुल हाउस (सूरज क्लॉथ स्टोर के अलावा कंस्ट्रक्शन का व्यवसाय भी सफलतापूर्वक चला रहे हैं। अशोक के पुत्र कुशल मोदी व पुत्री नमीषा रुपानी तथा राजेश के पुत्र श्रेयांश व दीपेन व्यवसाय को आगे बढ़ाने में योगदान दे रहे हैं। कुशल आज भी हर रोज अपने दादाजी को याद करते हैं। आज भी वे दादाजी के बिस्तर पर सोते हैं।

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