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मोदी के लिये ये हैं सबसे बड़ी चुनौती इन सब पर सरकार को करना होगा कंट्रोल !!

आजादी के बाद कालेधन को रोकने, अवैध आय को प्रकाश में लाने और वित्‍तीय लेन-देन की प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने…

आजादी के बाद कालेधन को रोकने, अवैध आय को प्रकाश में लाने और वित्‍तीय लेन-देन की प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने के लिए इनकम टैक्स (आईटी) से लेकर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) जैसी कई लोकतांत्रिक संवैधानिक संस्‍थाओं की स्‍थापना की गई, लेकिन जैसा काम ये संस्‍थाएं वर्तमान में कर रही हैं, वैसा बीते 60 सालों में कभी देखने में नहीं आया है। मोदी सरकार का यह काम ऐतिहासिक है, क्‍योंकि इन संवैधानिक संस्‍थाओं को काम करने की पूरी छूट देने के बाद नोटों के जमाखोरों पर जैसी चोट हो रही है, वैसी कभी देखने में नहीं आई।

दरअसल, जो परिदृश्‍य सामने है, उससे यह भी पता चल रहा है कि कहां एक तरफ आम आदमी खाते में पैसे होने के बावजूद पाई-पाई के लिए मोहताज़ है, और बैंकों का चक्कर काट रहा है, तो वहीं दूसरी ओर प्रवर्तन निदेशालय, केंद्रीय जांच ब्यूरो और इनकम टैक्स के छापों में चंद लोगों के पास से कई-कई करोड़ रुपए ज़ब्त किए जा रहे हैं। मीडिया में आई खबरों के मुताबिक आईटी के छापों में निजी और नैशनलाइज़्ड बैंक ही नहीं, बल्कि रिज़र्व बैंक के अधिकारी भी पकड़े जा रहे हैं।

हालांकि इस बात में भी कोई दो राय नहीं है कि डिमॉनिटाइज़ेशन पॉलिसी यानी विमुद्रीकरण नीति की घोषणा को एक महीने से कुछ ज़्यादा हो गए हैं, लेकिन तमाम बैंकों और एटीएम के सामने लगने वाली लाइन कम होने का नाम ही नहीं ले रही है। मुंबई में हालात अपेक्षाकृत थोड़े सुधरे हुए ज़रूर लग रहे हैं, लेकिन देश के बाक़ी हिस्से में लंबी लाइनों का सिलसिला बरक़रार है। यह सच है कि नवंबर महीने में जितनी भीड़ थी, अब उतनी नहीं है, लेकिन अब भी लोग अपने ख़ून-पसीने की कमाई बैंक से निकालने के लिए कई-कई घंटे संघर्ष कर रहे हैं।

परेशान लोगों के जले पर नमक छिड़कते हुए केंद्र सरकार और रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया की ओर से दावा किया जा रहा है कि 90 फ़ीसदी एटीएम अपडेट कर दिए गए हैं और वे काम करने लगे हैं, लेकिन सच तो यह है कि किसी भी ओर निकल जाइए, आपको हर जगह 90 फ़ीसदी एटीएएम केंद्रों पर शटर गिरा हुआ ही दिखेगा। अभी एक न्यूज़ चैनल ने मुंबई में कोलाबा से बोरिवली, मुलुंड और मानखुर्द तक सभी निजी और राष्ट्रीयकृत बैंकों के एटीएम चेक करवाया, तो पता चला कि 90 फ़ीसदी से ज़्यादा एटीएम पर अब भी ताला लगा हुआ है।

हालांकि देखा जाए तो सरकार और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया बैंकों के पास पर्याप्‍त मात्रा में पैसे पहुंचाए जाने के दावे में दम भी दिखाई देता है, क्‍योंकि रिज़र्व बैंक के डिप्टी गवर्नर आर गांधी ने 13 नंवबर को अधिकृत बयान जारी किया कि नोटबंदी के बाद 10 दिसंबर तक बैंकों ने 35 दिन में 4.61 लाख करोड़ रुपये नए नोट वितरित कर दिए गए हैं। यह कम से कम इतने तो हैं कि बैंक यदि इसे पर्याप्‍त मात्रा में जनता को ठीक से पहुंचाते तो संभव हो वह दिक्‍कत नहीं आती, जो बीच में आई थी।

बता दें कि आरबीआई ने मात्रा के हिसाब से बाजार में कुल 21.8 अरब नोट जारी किए हैं। इनमें से 20.1 अरब नोट 10, 20, 50 और 100 रुपये के हैं, वहीं 500 और 2,000 रुपये के कुल 1.7 अरब नए नोट जारी किए गए हैं, जबकि दूसरी ओर बैंकों में 12.44 लाख करोड़ रुपये के पुराने 1000 और 500 के नोट जमा हुए हैं। रिजर्व बैंक और करेंसी चेस्ट को लौटाए गए पुराने नोट 12.44 लाख करोड़ रुपये के हैं। वहीं दूसरी ओर बैंकों में अब तक 12.44 लाख करोड़ रुपये के पुराने 1000 और 500 के नोट जमा हुए हैं, अभी इससे कुछ ही ज़्यादा करेंसी कालाधन के रूप में लोगों के पास है, जिसके 30 दिसंबर तक बैंक में जमा होने की उम्मीद है।

बहरहाल, बैंकों की भूमिका सवालों के घेरे में आने बाद सवाल यह उठता है कि क्या बैंकवाले केंद्र सरकार को ग़लत रिपोर्ट दे रहे हैं? अगर हां, तो फिर दूसरा सवाल यह है कि बैंकवाले ऐसा क्यों कर रहे हैं? आख़िर कौन हैं वे लोग, जो सरकार को गुमराह करते हुए बता रहे हैं कि 90 फ़ीसदी एटीएम काम करने लगे हैं? दरअसल, जिस तरह से देश में रोज़ाना अलग-अलग हिस्से में करोड़ों रुपए में नई करंसी के पकड़े जाने की ख़बरें आ रही हैं, उससे लोग हतप्रभ हैं कि वे तो महज़ दो हज़ार रुपए की एक नोट पाने के लिए कई-कई घंटे एटीएम की क़तार में खड़े हो रहे हैं, फिर इतनी बड़ी मात्रा में नई करेंसी चंद लोगों के पास कैसे पहुंच रही है?

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राष्‍ट्रीय न्‍यूज चैनलों, अखबारों से लेकर, मीडिया में तमाम तरह से जो सूचनाएं प्राप्‍त हो रही हैं, उसके मुताबिक प्रवर्तन निदेशालय, सीबीआई और इनकम टैक्स अधिकारियों की जांच में जो तथ्य सामने आ रहे हैं, उन पर एक बार किसी को यक़ीन नहीं होगा। इन्‍हीं सूचनाओं के आधार पर देखें तो पिछले 30-33 दिनों में बैंकवालों ने जो कुछ किया, उससे देश का पूरा बैंकिंग सिस्टम सवालों के घेरे में आ गया लगता है? ऐसे तो ना केवल निजी बैंकों में घपले हुए हैं,  बल्‍कि कई नैशनलाइज़्ड बैंकों पर भी उंगलियां उठना शुरू हो गईं हैं।

मीडिया में आई खबरों के मुताबिक रिज़र्व बैंक का अधिकारी भी कालाधन सफ़ेद करने के अभियान में लगा हुआ पाया गया और पकड़ा गया। बेंगलुरु से 93 लाख रुपए के नए नोट बरामद होने की घटना सामने आने के बाद अब पुलिस ने रिजर्व बैंक अधिकारी के माइकल को गिरफ्तार कर लिया। माइकल पर 1.51 करोड़ के पुराने नोटों को नई करेंसी से बदलने का आरोप है। माइकल कमीशन के लिए पुराने नोटों को नए नोटों से बदल रहा था। इसके पास से 17 लाख रुपए नकद बरामद हुआ है। इस अधिकारी पर दलालों के साथ मिलकर कालेधन को सफेद करने का आरोप है।

यही नहीं खबरें यह भी हैं कि सीबीआई ने बेंगलुरु के इंदिरानगर शाखा के एक बैंक के चीफ़ मैनेजर को फर्जीवाड़े में पकड़ा है। दरअसल, नोटबंदी की घोषणा के बाद इस ब्रांच मैनेजर ने पूरी शाखा के साथ मिलकर अपने खाताधारकों के पैनकार्ड का गलत इस्तेमाल करके अवैध लेन-देन किया। बैंक ने ग्राहकों को एक बार पैसे देकर उनके पैन कार्ड का विवरण ले लिए, जब कस्टमर्स दोबारा ब्रांच में गए, तो उन्हें नए नोट नहीं होने का हवाला देकर लौटा दिया गया। बैंकरों ने इन कस्टमर्स को पैसे देने के बजाय नए नोटों का अवैध लेन-देन किया।

सीबीआई जांच में पाया गया कि ऐसे ही एक बैंक के 31 एटीएम में डाले जाने के लिए 1.30 करोड़ रुपये के नए नोट जारी किए गए थे, लेकिन पैसे कर्नाटक सरकार के शीर्ष अधिकारी सहित अनेक सहयोगियों के पास पहुंच गए। हालांकि बाद में इन सबको सस्पेंड कर दिया गया। दरअसल, नोटबंदी के बाद दो दिन एटीएम बंद रहे। इस दौरान कछेक एटीएमों को अपडेट कर दिया गया। इसके बावजूद एटीएम चालू नहीं किए गए। कई यूं ही डेड पड़े रहे। अब जांच में पता चला है कि एटीएमों के लिए दिए गए नए नोटों से कालाधन सफेद किया गया और नए नोट काले धनवालों के पास पहुंचा दिया गया।

बहरहाल, सवाल यह उठता है कि बैंकवालों ने जो कुछ किया, वे तमाम बुरे कारनामे अगर सार्वजनिक कर दिए गए तो क्‍या लोग बैंकों पर दोबारा कभी भरोसा करेंगे? लोग बैंकों पर आंख मूंदकर भरोसा करते रहे हैं, और स्वेच्छा से अपने व्यक्तिगत दस्तावेज़ उनके हवाले कर देते हैं। भविष्य में जब उन्हें पता चलेगा कि उनके व्यक्तिगत दस्तावेज़ों को ग़लत इस्तेमाल किया गया तब खाताधारक को क्या सदमा नहीं लगेगा?

खास बात ये है कि रोज जिस तरह की 10 या 12 छापे पड़ने की खबरें आ रही हैं, उससे ऐसा लग रहा है कि देश में यह पहली ऐसी सरकार है, जिसने लोकतांत्रिक संस्‍थाओं का इतना शानदार और सटीक इस्‍तेमाल कालेधन के खिलाफ किया है, तो क्‍या ये माना जाए कि बैंक अधिकारियों ने 8 नवंबर के बाद जमकर घोटाला किया गया? लोगों की यह भी धारणा बन गई है कि जनता को जो भी कठिनाई हो रही है, उसके लिए केवल बैंकवाले ही ज़िम्मेदार हैं?  क्‍या यह नहीं माना जाए अकूत कालाधन रखने वाले नहीं चाहते हैं कि प्रधानमंत्री की नोटबंदी के ज़रिए कालाधन नष्ट करने की योजना फलीभूत हो,  इसलिए वर्कलोड का रोना रोते हुए इस योजना की हवा निकाल रहे हैं। बैंक अफसर नोटबंदी के लूपहोल्स का फ़ायदा उठाकर कालाधन जमकर सफ़ेद कर रहे हैं।

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दरअसल,  देखा जाए तो इस समय मोदी सरकार के लिए इस समय सबसे अहम और बड़ी चुनौती  ना केवल बैंकिंग सिस्‍टम में जनता का भरोसा बनाए रखने की है, साथ ही जनता के बीच यह भी बताने की है कि सरकार नाम की कोई चीज है। देखा जाए तो सरकार के लिए यह एक बेहद कठिन समय है। वह 8 नवंबर के बाद ही एक नहीं, कई मोर्चों पर एक साथ जूझ रही है। कालेधन के खिलाफ जंग में एक ओर उसके सामने जनता की परेशानियां हैं, तो वहीं दूसरी ओर विपक्ष के हल्‍ला बोल के बीच बैंकिंग सिस्‍टम भी उसके लिए एक नई चुनौती बनकर सामने आया है। एक तरह से यह समय मोदी सरकार के सामने जनता के विश्‍वास को हासिल करने का है, जहां नीति के साथ कूटनीति भी है, कड़ाई भी और कालेधन वालों पर प्रहार भी है।

खास बात यह है कि सरकार के इस कदम को जनता ने सिर आंखों पर लेकर समर्थन भी दिया है, और वह प्रधानमंत्री के साथ नजर आती है। यही वजह है कि आजकल ट्रेन या बस में नोटबंदी और बैंकर्स के कथित भ्रष्टाचार की ही चर्चा है। लोग खुलेआम कह रहे हैं कि बैंकवालों ने पूरे जीवन की कमाई एक महीने में ही कर ली क्‍योंकि जिस तरह से रोज़ाना नई करेंसी देश के हर कोने से ज़ब्त हो रही है, उससे तो लोगों की आशंका सच लग रही है। चर्चा ऐसी भी सुनने में आई है कि ओवरटाइम कार्य का हवाला देकर बैंकवाले केवल कालेधन को सफ़ेद करने में जुटे हैं। मुंबई में दादर पूर्व में एक बैंक के गेट के सामने सैंडविच बेचने वाला एक दिन उसी बैंक से सौ-सौ रुपए के कई बंडल लेकर निकला। पूछने पर पहले तो उसने आनाकानी की, फिर बताया कि बैंक में उसकी सेटिंग है, इसलिए, उसने ख़ूब पैसे एक्सचेंज किए।

देखा जाए तो सरकार को अब ज्‍यादा सख्‍ती बरतते हुए नोटबंदी पर बैंकों की भूमिका की जांच करने के लिए ईडी, सीबीआई और इनकमटैक्स डिपार्टमेंट का एक टॉस्क फोर्स या आयोग का गठन करना चाहिए। इतना ही नहीं बैंकों में काम करने वालों की निजी संपत्तियों की जांच की जानी चाहिए और उनकी संपत्ति की उनके आय के स्रोतों से मिलान की जानी चाहिए। इसके अलावा नोटबंदी के बाद जिन लोगों को पुराने नोट स्वीकार करने अनुमति दी गई थी, उनके लेन-देन की बारीक़ी से जांच होनी चाहिए कि 8 नंवबर के बाद उनका लेन-देन अचानक बढ़ क्यों गया, जबकि नोटबंदी के बाद पूरा देश मंदी के दौर में है।

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