आखिर कौन था तैमूरलंग कैसे मिला ये नाम ,बहुत डरावना रहा हैं तैमूर का इतिहास?

नई दिल्ली। बॉलीवुड अभिनेता सैफ अली खान और करीना कपूर के बेटे के नाम तैमूर अली खान को लेकर सोशल मीडिया पर हंगामा मचा हुआ है। इस नाम को लेकर सोशल मीडिया पर काफी चर्चा हो रही है कि आखिर सैफ और करीना को अपने बच्चे के लिए यही नाम क्यों सूझा? इस नाम को लेकर हंगामा क्यों बरपा है, ये जानने के लिए हम आपको इतिहास में लेकर चलते हैं। आपको बताते हैं कि कौन था तैमूरलंग?

तैमूर का जन्म 1336 उज्बेकिस्तान के एक आम परिवार में हुआ था। कहा जाता है कि तैमूरलंग एक मामूली चोर था, जो मध्य एशिया के मैदानों और पहाड़ियों से भेड़ों की चोरी किया करता था। जन्म के समय नाम तैमूर रखा गया था, लेकिन आगे हुई एक घटना के बाद उसे तैमूर-ए-लंग कहने लगे।

तैमूर 1369 में समरकंद का शासक बना और उसके बाद उसने विजय और क्रूरता की यात्रा शुरू की। तैमूर की क्रूरता के कई किस्से मशहूर हैं। कहा जाता ‍कि एक जगह उसने दो हजार जिंदा आदमियों की एक मीनार बनवाई और उन्हें ईंट और गारे में चुनवा दिया।

एक लड़ाई में तैमूर के शरीर का दाहिना हिस्सा बुरी तरह घायल हो गया था, इसके बाद यही नाम बिगड़ते बिगड़ते तैमूरलंग हो गया। तैमूरलंग के बारे में कई किस्से मशहूर हैं, कहा जाता है कि वह एक हाथ से तलवार पकड़ सकता था। तैमूरलंग का 1405 में निधन हुआ था, तब वह चीन के राजा मिंग के ख़िलाफ युद्ध के लिएजा रहा था। वह 35 साल तक युद्ध के मैदान में लगातार जीत हासिल करता रहा था।

तैमूर...वो नाम, जो मौत के बाद भी पूरी दुनिया को डराता रहा...!
(Getty images )

नई दिल्ली। एक्ट्रेस करीना कपूर खान को सपने में भी गुमान नहीं होगा कि उनके बेटे के नाम को लेकर एक नई बहस छिड़ जाएगी। लेकिन ऐसा ही कुछ हुआ। कल जैसे ही करीना-सैफ ने अपने बेटे के नाम का ऐलान किया, जैसे आफत ही आन पड़ी। इन्होंने अपने बेटे का नाम तैमूर अली खान रखा जो कईयों को नागवार गुजर रहा है। कई लोगों को तैमूर नाम पर भारी एतराज है। सैफ के ऐलान के साथ ही ये नाम तैमूर सोशल मीडिया पर छाया गया। लोग तैमूर और उसके अत्याचारों को इस नाम से जोड़ने लगे।

पर हकीकत क्या है, क्या वास्तव में तैमूर क्रूर और खतरनाक था? क्या उसकी मौत के बाद हुई घटनाएं चौंकाने वाली हैं? ऐतिहासिक उल्लेख इस बात की पुष्टि करते हैं कि तैमूर लंग ने अपने साम्राज्य विस्तार के लिए पूरी दुनिया में सालों तक हमले किए। भारत पर भी उसने हमला किया और हजारों लोगों को मौत के घाट उतार दिया। यही नहीं तैमूर अपनी मौत के बाद भी लोगों को ‘डराता’ रहा। तैमूर का लातिनी नाम टेमरलेन है।

तैमूर को एक अप्रैल 1405 में मौत के बाद उज्बेकिस्तान के समरकंद में मौजूद बाग गुर-ए-आमिर में दफन किया गया था। गुर-ए-आमिर का पर्सियन में मतलब है राजा का मकबरा। समरकंद में ही उसका जन्म हुआ था। इतिहास के ऐसे कई उदाहरण हैं जो ये बताते हैं कि तैमूर ने अपनी मौत के बाद भी अपना खौफ बनाए रखा है। दो ऐसे मामले यहां गौर करने लायक हैं।

1.नादिर शाह का कब्र से पत्थर ले जाना

उस दौर की मुस्लिम इमारतों में ऊपर के पत्थरों को सिर्फ सजाया जाता था,  असली कब्र नीचे तहखाने में होती थी। तैमूर की कब्र भी एक भारी बेशकीमती पत्थर गहरे हरे जेड से ढंकी थी। 1740 में नादिर शाह इस पत्थर को पर्सिया (ईरान) ले गया जहां ये पत्थर दुर्भाग्यवश दो हिस्सों में टूट गया। कहा जाता है कि इसके बाद नादिर शाह को काफी बुरा वक्त देखना पड़ा। एक वक्त उसका पुत्र मौत के बेहद करीब पहुंच गया था। धार्मिक सलाहकारों के कहने पर उसने वो पत्थर वापस तैमूर की कब्र पर पहुंचा दिया और उसके हालात सुधर गए।

2.तैमूर की कब्र फिर खोली गई (1941-1942)

1941 में रूस के जोसेफ स्टालिन ने तैमूर की कब्र को खोलने का आदेश दिया। सोवियत मानव विज्ञानी मिखाइल गैरिस्मोव ने 1941 में कब्र को खोला था और बताया था कि तैमूर की लंबाई करीब 6 फीट थी और वह दाएं पैर और दाएं हाथ से अपंग था। (25 साल की उम्र में गंवाए थे अंग)।

लिखी थी चेतावनी

कहा जाता है कि तैमूर की कब्र पर गैरिस्मोव को दो चेतावनी लिखी मिली थीं जो इस तरह थीं। 1- जब मैं अपनी मौत के बाद दोबारा उठ खड़ा होऊंगा तो पूरी दुनिया कांप उठेगी। 2- जो भी मेरी कब्र को खोलेगा वो शत्रु से बुरी तरह से हारेगा। वो शत्रु मुझसे भी ज्यादा भयानक होगा। 3- बुजुर्ग लोग और एक मौलाना ने मिखाइल गैरिस्मोव और ताशमुहम्मद केरी नियाजोव (जो इस खुदाई के प्रमुख संचालनकर्ता थे) से कहा कि मुसीबत आने वाली है, लेकिन उनकी बात को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया। इन लोगों ने चेताया कि तीन दिन के अंदर मुसीबत आएगी और आफत उसकी जमीन पर गिरेगी जिसने ये खोला है। कब्र खोदे जाने के अगले ही दिन 22 जून 1941 को हिटलर ने सोवियत संघ पर हमला कर दिया। यह हमला युद्ध के बिना किसी औपचारिक ऐलान के हुआ। हिटलर ने इसे ऑपरेशन बारबरोसा का नाम दिया।

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अस्थियां कीं दफन

जर्मनी के कई हमलों के बाद स्टालिन ने तैमूर की अस्थियों को फिर से पूरी इस्लामिक रीति रिवाजों के साथ उसी कब्र में दफन करने का आदेश दिया। ये हुआ 20 दिसंबर 1942 को। तैमूर की अस्थियों को फिर दफनाए जाने के कुछ समय बाद जर्मन सेनाओं ने आत्मसमर्पण कर दिया और रूसियों ने स्टेलिनग्राद की लड़ाई जीत ली। ये लड़ाई इतिहास की सबसे खूनी लड़ाइयों में से एक कही जाती है।

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रहस्यमय थी तैमूर की कब्र

जब तैमूर की कब्र को खोला गया तो उसमें तैमूर के कंकाल के साथ साथ चांदी के धागों में लिपटे हुए धातु पत्र मिले जिनमें कुरान की आयतें लिखी हुई थीं। तैमूर के कंकाल का मुख मक्का की ओर था। ताबूत को खोलने पर उसमें कपूर और बालसम (मिर्र) की गंध आ रही थी। इस पर रखे हरे रंग के पत्थर जेड की लंबाई करीब 12 फीट और चौड़ाई 43 सेमी (17 इंच), मोटाई 35 सेमी (14 इंच) थी। तैमूर की कब्र 20 जून 1941 को खोली गई जो फौरन ही लोबान, कपूर और रेजिन की दुर्गंध से भर गई। पहले ये सोचा गया कि ये दुर्गंध बुरी बाधाओं के कारण है बाद में ये मालूम पड़ा कि गंध एंबामिंग में इस्तेमाल हुए अलग-अलग तेलों की है।

जो इस बात की तस्दीक कर रही थी कि उसे एंबाम किया गया था। इतिहास के उल्लेख कब्र खोले जाने के बाद प्रमाणित भी हुए। हालांकि जब उसकी कब्र खोली गई तो वह ताबूत में मिला न कि किसी मिट्टी में दफन।

बुक रेफरेंस-1. ऑर्थोडक्सी, इन्नोवेशन एंड रिवाइवल: कंसिडरेशन ऑफ दे पास्ट इन इंपीरियल मुगल टोम्ब कल्चर- माइकल ब्रांड

2. हिस्ट्री ऑफ तैमूर बैक- शर्फ उल दीन अली यज्दी

3. ताज महल या ममी महल- अफसर अहमद

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